AjgarGeeta (Hindi Version)
अजगर गीता - परिचय
महाभारत के शान्तिपर्व में छिपा एक ऐसा रत्न, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था - अजगर गीता। कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह, राजा युधिष्ठिर के एक सीधे और मानवीय प्रश्न का उत्तर देते हैं - "मैं किस प्रकार जिऊं कि शोकरहित रहूं?" इसी उत्तर में वे एक भीतरी कथा सुनाते हैं, जिसमें भक्त प्रह्लाद की भेंट एक ऐसे मुनि से होती है, जो अजगर के समान जीवन जीते हैं - जो मिले उसे सहजता से स्वीकारना, जो न मिले उसकी चाह न करना।
इन ३७ श्लोकों में मुनि, समभाव, अनासक्ति, स्वधर्म और साक्षी-भाव जैसे वेदांत के गहनतम सिद्धांत अत्यंत सरल, रोज़मर्रा के उदाहरणों के माध्यम से समझाते हैं। यह ज्ञान किसी वनवासी साधु तक सीमित नहीं - प्रह्लाद जैसे राजा के लिए, यानी हर उस गृहस्थ के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है, जो सत्ता, संपत्ति और उत्तरदायित्व के बीच शांति खोज रहा है।
